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रिशांग कीशिंगः नेहरू के साथ भी, नेहरू के बाद भी

एंड्र्यू नॉर्थ, नई दिल्ली। रिशांग कीशिंग को आज भी याद है वह सफ़र जब वह साल 1952 में भारत की पहली संसद के लिए चुने गए थे। साइकिल पर सवार रिशांग जब दिल्ली के व्यस्त कनॉट प्लेस से गुज़रे तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया। भारतीय संसद में मणिपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले रिशांग बताते हैं कि पुलिस ने बताया कि यह वन-वे ट्रैफिक है और मैं ग़लत दिशा में जा रहा हूं। वह आगे बताते हैं कि मैंने जवाब दिया कि हमारे यहां ऐसा नहीं होता, लेकिन मैं इसके लिए माफ़ी मांगता हूं। तब उन्होंने मुझे जाने दिया। 94 साल के रिशांग कीशिंग भारत ही नहीं, विश्व के सबसे उम्रदराज़ सांसद हैं। कुछ ही दिनों में वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं। कीशिंग अतीत को लेकर बेहद भावुक हो उठते हैं। फिर देश में संसद की मौजूदा तस्वीर की बात छेड़ने पर वह मायूस हो जाते हैं। हंगामे के कारण आए दिन संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है और अब तो यह आम बात हो गई है। हद तो तब हो गई जब सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के एक सांसद ने लोकसभा में तेलंगाना बिल को रोकने के लिए मिर्च स्प्रे का इस्तेमाल किया। इससे कई सांसदों की तबियत ऐसी बिगड़ी कि उन्हें अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा। कीशिंग याद करते हैं कि हमारे लिए संसद एक मंदिर हुआ करता था। हम शांतिपूर्वक बहस में भाग लिया करते थे। मगर अब देखिए संसद की क्या सूरत बन गई है। अध्यक्ष का भी सम्मान नहीं होता। आधुनिक भारत का संसद अब समय की बर्बादी का पर्याय बन चुका है। मणिपुर में उनके घर की एक दीवार पर पहली संसद (साल 1952 से 1957) की एक तस्वीर टंगी हुई है। इसमें कीशिंग भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ दिखाई देते हैं। देश की संसद के बारे में कीशिंग की इन आलोचनाओं को केवल एक बुज़ुर्ग नेता की बात कह कर खारिज़ नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड गवाह हैं कि 15वीं लोकसभा के पिछले पांच सालों का कार्यकाल अब तक का सबसे निरर्थक कार्यकाल रहा। बीते पांच वर्षों में संसद में 327 विधेयक पेश किए गए उनमें से आधे ही पारित हुए। अधिकांश नेताओं का व्यवहार बिलकुल अपने पेशे जैसा ही है, व्यापारी और कथित अपराधी प्रवृति के। कुछ सांसद अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए नेता बने हैं। मौजूदा सांसदों में से करीब एक तिहाई ऐसे हैं जिन पर अपराधिक आरोप है। कुछ पर तो हत्या की कोशिश व जालसाजियों तक के आरोप हैं। ये सांसद कोर्ट से बचने को अपने पद व सत्ता का इस्तेमाल करते हैं। प्रमुख दलों की ओर से सुधार के आश्वासन के बावजूद ‘आपराधिक चरित्र के राजनेताओं’ की संख्या बढ़ी है। आत्मविश्लेषण की झलक कई मौकों पर मिली है। दो साल पहले संसद की 60वीं वर्षगांठ पर कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने कहा था कि संसद का सफ़र हमेशा कठिन व चुनौतीपूर्ण रहा। वेबसाइट 'न्यूजलॉंड्री' की संपादक मधु त्रेहान कहती हैं कि पिछले सत्र में सांसद ख़ुद की ही पीठ थपथपाने में व्यस्त थे। यही नहीं एक-दूसरे की प्रंशसा में कविताएं पढ़ी गईं। नेहरू के समय के संसदीय मानक आज कई मायनों में असामान्य नज़र आते हैं। नेहरू अमरीका और ब्रिटेन की वैधानिक परंपराओं से प्रभावित रहे। लेकिन आधुनिक नेता उनसे बचना ज़्यादा पसंद करते हैं। त्रेहान का कहना है कि हम अनुशासन में रहने वाले लोग नहीं हैं। यहां हर कोई ख़ुद को हीरो समझता है। आधुनिक संसद में भारतीय समाज में आए कुछ सकारात्मक बदलाव के संकेत हैं। तर्क हैं कि सामंती व्यवस्था पलट रही है। छोटी जातियां सत्ता के केंद्र में आ रही हैं। विपक्षी दल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के समर्थकों की आलोचना इस बात से हुई कि उन्होंने मोदी के गुजरात दंगों को न रोक पाने के सवाल पर उठ रही आवाज़ों को कथित तौर पर चुप कराने की कोशिश की। गुजरात के सांप्रदायिक दंगों में कम से कम 1,000 लोग मारे गए थे जिसमें अधिकांश मुसलमान थे। लेकिन भारत में नए आंदोलन का प्रतीक बने आम आदमी पार्टी के समर्थकों पर भी आलोचना को बर्दाश्त नहीं किए जाने के आरोप लगे। रिशांग कीशिंग सेवानिवृत के बाद अपना अधिकांश वक़्त स्थानीय स्कूलों से जुड़ी परियोजनाओं में लगाना चाहते हैं। वह लोगों को बताना चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र को शिव की तरह सारे विष का पान करना पड़ेगा। कीशिंग कहते हैं कि हमें निःस्वार्थ लोगों की सेवा करनी होगी। लोकतंत्र ने ही अलग-अलग भाषा, संस्कृति और धर्म के लोगों को एक धागे में बांध रखा है। (साभार)
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