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प्यार भी बे-हिसाब न भेजे

प्रभाकर मिश्र 
कोई ख़त में गुलाब न भेजे। प्यार भी बे-हिसाब न भेजे।
एक दीपक से काम चलता है, रात को आफताब न भेजे।
चाँद का हुस्न क़यामत कर दे, ग़र ये बादल नकाब न भेजे।
आज अश्कों से भरी हैं आँखें, नींद आए तो ख्वाब न भेजे।
ग़म का दरिया बहुत है पीने को, मुझको साकी शराब न भेजे।
अमन के शहर में दंगा कर दे, वक्त ऐसी किताब न भेजे।
इश्क में नाम पड़ गया आशिक़, और तमगे, ख़िताब न भेजे।

प्रभाकर मिश्र के फेसबुक वाल से
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