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फ़िल्म समीक्षाः ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ को क्यों कहें सुपरफास्ट!

मुम्बई। यूटीवी मोशन पिक्चर्स और रेड चिलीज़ की फ़िल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' में राहुल (शाहरुख़ ख़ान) 40 वर्षीय अविवाहित उत्तर भारतीय युवक हैं, जिसे उसके मां-बाप के गुज़र जाने के बाद उसके दादा (लेख टंडन) और दादी (कामिनी कौशल) ने पाल पोस के बड़ा किया। उसके दादा की आख़िरी ख़्वाहिश थी कि उनके मरने के बाद उनकी अस्थियों को रामेश्वरम में प्रवाहित कर दिया जाए। उनकी इच्छा के अनुसार वो उनकी अस्थियां लेकर चेन्नई एक्सप्रेस में सवार होता है। वैसे उसकी असल योजना होती है कि वो अपनी रामेश्वरम यात्रा को बीच में छोड़कर दो दोस्तों के साथ छुट्टियां मनाने गोवा चला जाए। फ़िल्म की कहानी काफ़ी उलझी हुई है और स्क्रीनप्ले में दोहराव है। ट्रेन में उसकी मुलाक़ात एक तमिल लड़की मीना (दीपिका पादुकोण) से होती है। कुछ लोग मीना का अपहरण करना चाहते हैं और मीना उनसे बचने का प्रयास करती है। दरअसल मीना के रिश्तेदार ही उसके पिता के आदेश पर उसका अपहरण करने की फ़िराक़ में होते हैं। उसके पिता (सत्यराज) कुंबन गांव के कुख्यात डॉन हैं और मीना की शादी उसकी इच्छा के विरुद्ध थंगबाली (निकतिन धीर) से करना चाहते हैं. इसी वजह से मीना घर से भाग जाती है। राहुल, अपनी योजना के मुताबिक़ गोवा नहीं जा पाता है क्योंकि वो परेशानी में घिरी मीना को देखता है और महसूस करता है कि उसे मदद की ज़रूरत है। अपहरणकर्ता राहुल और मीना को पकड़कर कुंबन गांव ले जाते हैं, जहां थंगबाली राहुल को चैलेंज करता है कि वो उसे हरा कर दिखाए। थंगबाली से डरकर राहुल वहां से भाग खड़ा होता है। उसे पकड़कर वापस गांव लाया जाता है लेकिन वो इस बार मीना सहित दोबारा भाग जाता है। वो दूसरे गांव जाते हैं और वहां पति-पत्नी की तरह रहने लगते हैं। इधर, मीना के पिता उसे किसी भी कीमत पर वापस लाना चाहता है। इस बीच राहुल को मीना से सच में प्यार हो जाता है और वो उसे थंगबाली के चंगुल से बचाना चाहता है। क्या राहुल अपने मक़सद में कामयाब हो पाता है? वो मीना को कुंबन गांव वापस क्यों ले जाता है? क्या मीना भी राहुल को पसंद करने लगी है? क्या मीना के पिता का ह्रदय परिवर्तन होता है? यही आगे की कहानी है। के.सुभाष की कहानी बेहद औसत दर्जे की है। युनूस सेजवाल का लिखा स्क्रीनप्ले (रॉबिन भट्ट के सहयोग से) भी प्रभावित नहीं करता। शाहरुख़ और दीपिका का रोमांस दर्शकों को अपील नहीं कर पाता। स्क्रीनप्ले में काफी दोहराव है और कई बार लगता है कि सिर्फ इधर उधर की घटनाओं को महज़ इकट्ठा करके दिखा दिया गया है। 'चेन्नई एक्सप्रेस' को एक कॉमेडी फ़िल्म के तौर पर पेश किया गया है लेकिन फ़िल्म के ज़्यादातर हिस्से में दर्शकों को हंसी ही नहीं आती। हां कुछ दृश्य ज़रूर ऐसे हैं जिनमें थोड़ी हंसी आती है लेकिन वो दृश्य ऐसे भी नहीं है कि दर्शक लोटपोट हो जाएं। एक दृश्य अच्छा बन पड़ा जिसमें शाहरुख़ ख़ान, दीपिका पादुकोण को हाथ का सहारा देकर ट्रेन में चढ़ाता है फिर उसके अपहरणकर्ताओं को भी हाथ का सहारा देकर ट्रेन में चढ़ा लेता है लेकिन उसके बाद ट्रेन सीक्वेंस काफी उबाऊ हो जाता है। गांव में घटने वाली घटनाएं भी काफी दोहराई गई और बोरिंग लगती है। क्लाइमेक्स, ज़रूर कसा हुआ है और दर्शकों को बांधे रखता है। शाहरुख़ अपने अभिनय से ख़ास प्रभावित नहीं कर पाते। फ़िल्म में तीन मुख्य कमियां हैं। पहली कमी- कहानी के मुताबिक़ मीना, परेशानी में घिरी हुई है और उसे मदद की ज़रूरत है लेकिन फ़िल्म में मीना का किरदार कुछ ऐसे गढ़ा गया है कि महसूस ही नहीं होता कि वो परेशानी में है और उसे मदद की ज़रूरत है। दूसरी कमी- ड्रामा बेहद उलझा हुआ है। तीसरा कमी- फ़िल्म में ढेर सारे तमिल संवाद है जिसकी वजह से ग़ैर तमिल भाषी लोगों को ये संवाद समझ में ही नहीं आते। फ़िल्म में ढेर सारे तमिल कलाकार हैं जिन्हें उत्तर भारतीय दर्शक पहचानते ही नहीं। फ़िल्म में रोमांस दर्शकों को बिलकुल अपील नहीं करता इसलिए वो इससे जुड़ ही नहीं पाते। शाहरुख़ ख़ान मुख्य किरदार में कहीं-कहीं पर तो शानदार रहे हैं लेकिन बाकी जगह अप्रभावी रहे। दीपिका पादुकोण ने अच्छा अभिनय किया है और दर्शकों का मनोरंजन किया है। दीपिका पादुकोण तमिल अंदाज़ में संवाद बोलती हुई प्यारी लगी हैं। उन्होंने अपना काम बखूबी निभाया है और दर्शकों का मनोरंजन किया है। निकतिन धीर के लिए फ़िल्म में करने को कुछ ख़ास नहीं है। उनका व्यक्तित्व ख़ासा वज़नदार है लेकिन उनका रोल कमज़ोर है। दीपिका पादुकोण के पिता के रोल में सत्यराज साधारण रहे हैं। पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में मुकेश तिवारी जमे हैं। कामिनी कौशन और लेख टंडन ठीक रहे हैं। 'वन टू थ्री फ़ोर' गाने में तमिल अभिनेत्री प्रियदर्शिनी अच्छी लगी हैं। बतौर निर्देशक रोहित शेट्टी ना तो एक अच्छी कॉमेडी फ़िल्म बनाने में सफल रहे हैं ना ही इसे एक रोमांटिक फ़िल्म के तौर पर पेश कर पाए हैं। रोहित शेट्टी ना तो एक अच्छी रोमांटिक फ़िल्म बना पाए हैं ना ही रोमांस को ठीक से पर्दे पर दर्शा पाए हैं। उन्होंने ड्रामा को तो ठीक तरह से पेश कर लिया है लेकिन फ़िल्म की कहानी का ग़लत चुनाव, फ़िल्म में ढेर सारे तमिल संवादों और चेहरों का इस्तेमाल इसके व्यापार पर विपरीत असर डालेगा। विशाल-शेखर का संगीत अच्छा है लेकिन इसमें सुपरहिट होने की क़ाबिलियत नहीं है। 'वन टू थ्री फोर' गाना अच्छा बन पड़ा है। अमिताभ भट्टाचार्य के गाने ठीक हैं और मासेस को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं। अमर मोहिले का बैकग्राऊंड संगीत अच्छा है। फ़िल्म के एक्शन दृश्यों में रोहित शेट्टी की झलक साफ़ नज़र आती है। चेन्नई एक्सप्रेस एक साधारण फ़िल्म बनके रह गई है। कुल मिलाकर चेन्नई एक्सप्रेस को मिली जुली प्रतिक्रिया मिलेगी। एक ख़ास दर्शक वर्ग को फ़िल्म पसंद आएगी लेकिन इसकी कॉमेडी एक बड़े दर्शक वर्ग को अपील नहीं कर पाएगी। शाहरुख़ की स्टार पावर की वजह से और ईद जैसे त्यौहार के मौक़े पर इसे अच्छी ओपनिंग ज़रूर मिल जाएगी लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पूर्वी पंजाब जैसे इलाकों में ये ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगी। फ़िल्म की प्रोड्यूसर कंपनी रेड चिलीज़ को इसके सैटेलाइट अधिकार और दुनिया भर के राइट्स यूटीवी को बेचकर पहले ही मुनाफ़ा हो चुका है लेकिन शाहरुख़ के प्रशंसकों को फ़िल्म विशेष उत्साह नहीं दे पाएगी। (साभार बीबीसी)
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