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समाज वटपूजा की वैज्ञानिकता को समझेः स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। वट-अमावस्या के दिन ऋषिकेश, मुनि की रेती, स्वर्गाश्रम एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की सैकड़ों महिलाओं ने परमार्थ निकेतन पहुँचकर वटपूजा की रस्म पूरी की। वट-अमावस्या पर इन महिलाओं ने परमार्थ परिसर में लगभग एक सौ साल पुराने वटवृक्ष का पूजन-अर्चन किया और अपने सुहाग के लिए आशीर्वाद मांगा। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1942 में स्थापित परमार्थ निकेतन के मुख्य परिसर में काफी पुराना विशाल बरगद का वृक्ष है, जिसका पूजन करने के लिए प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में महिलाएं परमार्थ निकेतन जाती हैं। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष श्री स्वामी चिदानन्द सरस्वती ‘मुनि जी महाराज’ ने वटपूजा के माहात्म्य की चर्चा करते हुए कहा कि वट-अमावस अर्थात् ज्येष्ठ-अमावस्या का दिन वर्ष का सबसे गरम दिन होता है। अपनी लम्बी जड़ों के माध्यम से अपने नीचे वर्ष भर के लिए पानी सुरक्षित करने की विशेषता वटवृक्ष में होती है। महान वैज्ञानिक हमारे ऋषियों ने इसीलिए ज्येष्ठ-अमावस्या के दिन वटपूजा का प्रावधान किया था और मानव समाज को सन्देश दिया था कि इस दिन पुुरुष बरगद के पेड़ के आसपास गहरे थलहे बनायें और महिलाएँ तीन दिन तक अर्थात् त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या को बालटियों आदि के जरिए भारी मात्रा में जल उसमें डालकर वटवृक्ष को प्रचुर मात्रा में पानी पिलाकर सिंचित करें। श्री स्वामी जी ने कहा कि कालान्तर में इस प्रथा का बुरी तरह क्षरण हुआ और वटपूजा की रस्म अदायगी भर रह गई। वर्ष के सर्वाधिक गर्म दिन पर जल देने की बजाए वटवृक्ष के पास दीपक जलाने, पानी बहुत ही थोड़ा ले जाने, पेड़ को धागों और कलावा से बुरी तरह बांधने और बरगद की सेवा करने के स्थान पर अपने घर में पूजा करने के लिए उसकी डालियाँ काटकर लाने आदि को ऋषि प्रणीत व्यवस्था के विरुद्ध बताया। श्री मुनि जी महाराज ने महिला और पुरुष दोनों समाजों को सन्देश देते हुए कहा कि वटपूजा के साथ जुड़ी कुरीतियों को दूर करके उसके असली स्वरूप को वापस लाने में सहयोगी बनें। हमारे ऋषियों और प्राचीन ग्रन्थों ने पेड़ों में भी देवताओं का वास बताया है, वटवृक्ष की वास्तविक सेवा करने से ही देवता का वरदान व आशीष प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने वट पूजा के लिए परमार्थ आईं महिलाओं के सुखी व शान्त जीवन तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
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