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बड़े सलीके से अपनी ब्रांडिंग में जुटा है कल्पतरु एक्सप्रेस

आगरा। हिन्दी दैनिक समाचार पत्रों की भीड़ से अलग आगरा और लखनऊ से प्रकाशित होने वाले कल्पतरु एक्सप्रेस बड़े ही सधे अंदाज में और सलीके से अपनी ब्रांडिंग में जुट गया है। अखबार की बेहतरी और ब्रांड को चर्चित करने का प्रयास में जुटे में समूह संपादक पंकज सिंह और कार्यकारी संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी के योगदान को उल्लेखनीय माना जा रहा है। इसी क्रम में कंपनी द्वारा हर माह मीडिया विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिससे कल्पतरु एक्सप्रेस की अच्छी ब्रांडिंग हो रही है। साथ ही कल्पतरू एक्सप्रेस में काम करने वाले संपादकीय और गैर संपादकीय कर्मियों के ज्ञान भी परिमार्जित हो रहे हैं। इससे आगरा के अन्य मीडिया घरानों में खलबली मची हुई है। कल्पतरु एक्सप्रेस के मीडिया विमर्श के तहत पिछले दिनों हिन्दी दैनिक 'देशबन्धु' के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव आगरा आए और उन्होंने 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के पत्रकारों को संबोधित किया। राजीव रंजन श्रीवास्तव ने आरंभ में सोवियत संघ की राजधानी मास्को में गुजरे उन वर्षों की स्मृति दोहराई जब वह वहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। वहां रहने वाले सात हजार भारतीयों के लिए संचार माध्यम की जरूरत को महसूस करते हुए उन्होंने 'भारत भूमि' नामक एक पाक्षिक पत्र का संपादन और प्रकाशन शुरू किया। बाद में इस पत्र को साप्ताहिक किया गया, क्योंकि दूर-दराज स्थित साइबेरिया जैसे इलाकों तक इस पत्र का खूब नाम स्वागत हुआ था। इंजीनियरिंग के अलावा व्यापार प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त कर राजीव रंजन ने खुद को पूरी तरह पत्रकारिता को समर्पित कर दिया। राजीव रंजन ने कहा कि पत्रकारिता उनके लिए शुरू से मिशन रही है। उन्होंने 'भारत भूमि' के प्रकाशन के लिए नौकरी करके खर्च जुटाया। उन्होंने बताया कि मास्को में ही 'देशबन्धु' परिवार के उत्तराधिकारी ललित सुरजन और उनकी बेटियों से उनका परिचय हुआ और फिर वे ललित सुरजन के दामाद हो गए। उनकी पत्नी अब मासिक पत्रिका 'अक्षर पर्व' का संपादन कर रही हैं। राजीव रंजन का कहना था कि आज भी यह संभव है कि नैतिक शक्ति और इरादे के साथ मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता की जाए। पत्रकारिता और व्यापक मीडिया कर्म के विषय में उनकी राय थी कि सूझबूझ और पेशागत प्रवीणता के साथ उन दबावों का प्रतिरोध किया जा सकता है जो निहित स्वार्थों की ओर से आते हैं। पत्रकारों को उनकी सलाह थी कि व्यापक जीवन से वैसे विषयों का चुनाव करना आज की जरूरत है, जो आमतौर पर आंखों से ओझल रहते हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि कोई मीडियाकर्मी अगर यमुना किनारे जाकर आगरा से दिल्ली तक यात्रा करे तो उसे आम जनजीवन की स्थितियां, संकट और प्रदूषण के इतने पहलू दिखाई देंगे जिनकी कल्पना दफ्तरों में बैठकर नहीं की जा सकती । उन्होंने अपने छह संस्करणों वाले अखबार 'देशबन्धु' की पत्रकारिता के विशिष्ट पहलुओं की चर्चा करते हुए यह जानकारी भी दी कि उनके अखबार को श्रेष्ठ ग्रामीण पत्रकारिता के लिए 12 बार राष्ट्री य पुरस्कार प्रदान किया गया है। राजीव रंजन की दृढ़ धारणा है कि गांवों में बसने वाले सत्तर प्रतिशत भारतीयों के जीवन को प्रतिबिंबित करने वाली पत्रकारिता ही दीर्घजीवी होगी और वह दिन दूर नहीं जब जनोन्मुख पत्रकारिता वाले क्षेत्रीय अखबार दिल्ली पहुंकर अपनी जगह बनाएंगे और उनके आगे तथाकथित बड़े अखबार दब जाएंगे। आरंभ में राजीव रंजन श्रीवास्तव का परिचय देते हुए 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के समूह संपादक पंकज सिंह ने उनके जीवन, शिक्षा और पत्रकारिता के संघर्षों के बारे में बताया। राजीव रंजन के व्याख्यान के बाद 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के अनेक पत्रकारों ने तरह-तरह के प्रश्न किए और लगभग डेढ़ घंटे तक अपने नाम के अनुरूप मीडिया विमर्श ने गंभीर और बेहद अथर्पूर्ण विमर्श का रूप ले लिया। कार्यक्रम के अंत में 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के कायर्कारी संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी ने विमर्श की विषय वस्तु को समेटते हुए राजीव रंजन श्रीवास्तव और उपस्थित सहकमिर्यों के प्रति आभार प्रदर्शित किया।
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