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मां के साथ अत्याचार क्यों?


डा.प्रदीप गुप्ता 

इंस संसार को चलाने वाली मां ही हैं, भले ही वह किसी बच्चे की मां हैं या फिर धरती मां। जीवन में मां के योगदान से बड़ा कोई योगदान नही होता। मां खुद गीले में सोकर अपने बच्चे को सुखे में सुलाती है और उम्र भर उसका ख्याल रखती है। मां के इस एहसान को कभी नही भुलाया जा सकता है, लेकिन उसके साथ आज दुर्व्यवहार क्यो? वही दुसरे ओर भूमंडलीकरण और खुलेपन के इस दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, साथ ही अपनी काबिलियत और योग्यता से हर किसी को हैरत में डाल रही हैं। इसके बावजूद उनके खिलाफ अपराधों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोज 57 मामले बलात्कार के दर्ज होते है। इक्तीस का अपहरण होता हैं, 42 महिलाए दहेज की शिकार होती हैं। 113 यौन उत्पीडन की शिकार होती हैं, और चौरासी से छेड़छाड़ की जाती हैं। महिलाओं से होने वाले अपराधों की संख्या सालाना दो लाख पहुंच गई हैं। देश के किसी न किसी कोने में हर घंटे युवा विवाहिता को या तो मार दिया जाता है या फिर मौत की तरफ धकेल दिया जाता हैं। दहेज मृत्यु का सालाना आकड़ा नौ हजार से अधिक है, जो एक दशक पहले केवल दो हजार था। महिलाओं पर हो रही हिंसा से चिन्तित केन्द्र सरकार ने उन्हे सुरक्षित रखने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश भी दिया हैं कि सुरक्षा संबधी कानुन को सख्ती से लागु किया जाए। प्रति वर्ष 15 हजार से ज्यादा औरते दहेज के नाम पर सतायी जाती हैं और औसतन छह से सात हजार औरते प्रत्येक साल दहेज हत्याओं की शिकार होती हैं। वर्ष 2010 में दहेज हत्या के 8172 मामले सामने आये थे। जाहिर है ये सिर्फ वही महिलाएं हैं जिन्होने पुलिस थाने तक जाने की हिम्मत जुटा पायी। वस्तुत: आज दहेज के नाम पर पैसा वसुलना धंधा बन चुका हैं। दहेज प्रथा या उत्पीड़न को रोकने के लिए 1961 में दहेज प्रतिरोध कानून पारित किया गया । दहेज लेने या देने वाले को छह माह से दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया कि अपने पति या संबधियों द्वारा दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर शिकायत कर सकती है। वर्ष 2010 में बालात्कार के 21467 केश दर्ज किए गये। अपहरण और अगवा के प्रमुख निशाने पर महिलाएं और लड़किया ही हाती रही। भारत में ऐसे 20416 मामले दर्ज किये गये जो वर्ष 2007 की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक है। लडकियों का व्यापार भी राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर होता हैं। प्राचीन काल से ही पुरूष प्रधान समाज की यह मानसिकता पीढ़ी दर पीढ़ी इतनी घर चुकी है कि पुरूष स्त्री का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। छोटी-छोटी बातों के लिए पती पत्नी पर तानाशाही दिखाता हैं। यह किसी भी स्त्री के लिए सवार्धिक अघात करने वाला अनुभव होता हैं। अगर बेटा की जगह बेटी हुई या फिर परिवार के किसी भी समस्या का दायित्व पत्नी पर मढ़ कर पीटने की घटना आम हो गई है। जैसे कि युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुशील शर्मा द्वारा कथित बदचलनी के शक में अपनी पत्नी नैना की गोलीमारकर उसका शव एक रेसोटोरेन्ट के तंदुर में डाल दिया गया। वही दूसरी ओर विश्व के 28 देशो (जिसमें ज्यादात्तर अफ्रीका में स्थित) में करीब 13 करोड़ महिलाओं के जननांग कमोवेश काटे जा चुके है। वही इस घटना का अंजाम भारत के मध्य प्रदेश में रह रहे एक परिवार ने अपनी बेटी के गुप्तांग को महज इसलिए दाग दिया क्योकि उसने एक निम्न जाति से ब्याह कबुल किया था। आखिर अब तक अरूषी, रिंकू चावला, दामिनी, गुडिया जैसी लड़किया अपनी जान कब तक गवाती रहेंगी। आखिर इन महिलाओं के खिलाफ अत्याचार कब बंद होगा।
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