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स्व में स्थित होना ही स्वस्थ होना हैः रमेश भाई ओझा

 
                                                       मन की चंचलता दूर करने वाली भक्ति की करें चाहः स्वामी  सत्यमित्रानन्द गिरि 
 ऋषिकेश। जो स्व में स्थित हो गया, वही स्वस्थ है। स्व की ओर अपने को लौटाकर जो अपने-आपको स्व में ही स्थिर कर ले, वही अध्यात्मवादी है। भागवत कथा समस्त भवरोगों की दवा है। इससे व्यक्ति में विवेक, स्नेह व सौजन्य का जागरण होता है। उसे सुख और शान्ति की प्राप्ति होती है। यह उद्गार परमार्थ गंगा तट पर 19 मई से चल रहे भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के तीसरे दिन 21 मई को परम भागवताचार्य सन्त श्री रमेश भाई ओझा ने देश-विदेश से आए ज्ञान पिपासुओं को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। आज की कथा में भारत माता मन्दिर के संस्थापक एवं निवर्तमान शंकराचार्य श्रीस्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि एवं परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष श्रीस्वामी चिदानन्द सरस्वती विशेष रूप से मौजूद रहे। श्री ओझा ने कहा कि कामना, स्पृहा, ममता और अहंकार को छोड़े बिना जीवन में शान्ति सम्भव नहीं है। शान्ति की तलाश में दर-दर घूम रहे लोगों को अपने जीवन से इन विकृतियों को दूर करना नितान्त जरूरी है। प्रभु श्रीराम के गुणों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि शान्तं, शाश्वतं, अप्रेयमं, अनघं, निर्वाण-शान्तिप्रदं जैसे श्रीराम के गुणों को जीवन में उतारने से श्रीराम कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि जिस तरह सूर्य कभी अस्त या उदय नहीं होता, उसी तरह आत्मा न कभी पैदा होती है और न मरती है। भाईश्री ने प्रातिभासिक, व्यावहारिक एवं पारमार्थिक सत्ताओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। श्री रमेश भाई ओझा ने मानव जीवन को जीवात्मा की लम्बी यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह शरीर रूपी नौका तरने के लिए मिली है। सद्गुरुरूपी तारणहार इस जीवन में प्रभुकृपा से मिले हैं। भगवान की कृपानुकूल हवा भी चल रही है। इसके बावजूद जो तरना नहीं चाहता है, उससे बड़ा कोई आत्म-हत्यारा नहीं है। विद्वान भागवताचार्य ने श्रोताओं को सलाह दी कि वह भगवान के प्रति दास का भाव रखें, मैं भगवान का हूं यह ज्ञान और भाव सदैव बना रहे। उन्होंने कहा कि इस लोक और परलोक में भगवान ही मेरे हैं, यह भाव भक्त और भगवान को एकाकार कर देता है। मानव मात्र को पशु प्रवृत्ति से अलग रखने का सत्परामर्श देते हुए श्री ओझा ने श्रोताओं से पूछा! मनुष्य और कुत्ते में क्या अन्तर है? कुत्ते के कान मनुष्य से ज्यादा पावरफुल हैं, फिर भी केवल मनुष्य ही कथा का आनन्द ले सकता है। इस शरीर रूपी स्मार्ट फोन में इतने एप्लीकेशंस हैं जिनका हमें पता ही नहीं है। इसमें संगीत है, ई मेल है, घड़ी है, फेसबुक है, स्काई पीसी है और न जाने क्या-क्या है। उन्होंने मानव काया के माध्यम से ब्रह्मानुभूति करने के विभिन्न उपायों की भी चर्चा की। आज की कथा के समापन के पूर्व स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि ने परमार्थ परिवार एवं संस्कृति परिवार के सभी सदस्यों को इतनी सुन्दर कथा के लिए बधाई दी। कहा कि परमार्थ निकेतन के सामने से गंगा अपने प्रवाह की दिशा को जा रही हैं, लेकिन भाईश्री ने अपनी कथा के माध्यम से ज्ञान गंगा को विपरीत दिशा में हिमालय की ओर मोड़ दिया है, जिसके लिए वह बधाई और सराहना के पात्र हैं। भक्ति, विवेक, श्रेय, प्रेय एवं मन की स्थिरता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने श्रोताओं को प्रेरणा दी कि वे प्रभु से ऐसी भक्ति की याचना करें, जो मन की चंचलता को दूर कर दे और सद्विवेक का जागरण कर दे। इसके लिए उन्होंने ध्यान और स्वाध्याय को जरूरी बताया। आज की कथा का श्रीगणेश श्री स्वामी चिदानन्द सरस्वती द्वारा सन्त श्री रमेश भाई ओझा के अभिनन्दन से तथा समापन श्री भागवत पुराण की आरती के साथ हुआ। इस मौके पर देश-विदेश के हजारों कथा प्रेमियों व श्रद्धालुओं के अलावा स्मृतिशेष श्री दीनदयाल जालान परिवार के सभी सदस्य एवं परिजन भी मौजूद थे। सायंकाल सन्त श्री ओझा सहित सभी श्रद्धालुओं ने गंगा आरती में भाग लिया। प्रख्यात भोजपुरी गायक श्री मनोज तिवारी के गीतों से गंगा आरती में आए लोग और कथाप्रेमी झूम उठे।
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