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पाकिस्तान में लोकतंत्र जीता, नवाज पर टिकी निगाहें

राजीव रंजन तिवारी पाकिस्तान में चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने से पहले ही तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने कहा था कि उसका लोकतंत्र में भरोसा नहीं है। वह चुनाव नहीं होने देगी। उसने अंत-अंत तक बम बरसाए और तीन पार्टियों को निशाने पर भी रखा। यह चुनाव वहां एक तरह से लोकतंत्र का इम्तिहान था। इसमें वे खरे उतरे हैं। इस माहौल में भी वहां 50 फ़ीसदी से अधिक मतदान हुआ। इसके लिए पाकिस्तान की जनता को बधाई दिया जाना चाहिए। यहां लोकतंत्र जीत गया है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के हाथों में देश की कमान आ चुकी है। इस चुनाव में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) प्रमुख नवाज शरीफ अंग्रेजी कहावत के अनुरूप थर्ड टाइम लकी बनकर उभरे हैं। 11 मई को हुए चुनाव में चुनाव आयोग के मुताबिक 60 फीसदी मतदान हुए थे। पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली के सदस्यों की संख्या 342 है, लेकिन इनमें सिर्फ 272 सदस्य ही प्रत्यक्ष मतदान के जरिए चुने जाते हैं। बाकी 70 सीटों में से 60 महिलाओं और 10 गैर मुस्लिमों के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों पर चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व नियमों के जरिए होता है। अब पूरी दुनिया की नजरें नवाज शरीफ पर टिक गई हैं। इस स्थिति में उनके इस बयान का आकलन आरंभ हो गया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वह देश में बदलाव के लिए काम करेंगे। निश्चित रूप से बदलाव की बहुत जरूरत है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी पाकिस्तान में हुए इस सियासी बदलाव का अध्ययन किया जा रहा है। गौरतलब है कि पाकिस्तान में चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने से पहले ही यह आशंका जतायी जा रही थी कि बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) दुबारा में सत्ता में नहीं लौटेगी। यह अलग बात है कि पीपीपी के नेतृत्व वाली सरकार ने पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया है। दरअसल, वहां अतीत की सरकारों का सेना तख्तापलट करती रही है। पाकिस्तान की तारीख का आधा से अधिक समय सैन्य शासन में गुजरा है। लेकिन अब ज्यादातर सर्वे नवाज शरीफ के सत्ता में पुन: वापसी की ओर संकेत कर रहे थे। जो हो गया। खैर, नवाज शरीफ की पाकिस्तान में सरकार बनेगी, इसमें कोई शक नहीं है। इस स्थिति में सवाल यह उठता है कि उनकी आतंकवाद और भारत के प्रति नीतियां कैसी होगी। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने आतंकवादियों को खुश करने का एलान किया था। कहा था कि आतंकवाद के विरूद्ध चल रहे वैश्विक युद्ध से हम पाकिस्तान को अलग कर लेंगे। नवाज अपनी इस घोषणा पर अमल करते हैं तो वह भारत के लिए सिरदर्द बन सकती है। यानी कश्मीर में फिर से आतंकवाद को हवा मिल जाएगी। यह अलग बात है कि उन्होंने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा है कि भारत विरोधी गतिविधियां नहीं होने दूंगा। नवाज शरीफ ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों को 1999 में हमने जहां छोड़ा था वहीं से शुरुआत करने की जरूरत है। भारत के लोग शरीफ से उम्मीद कर रहे हैं कि सत्तासीन होने के बाद वह मुंबई हमलों की सुनवाई में तेजी लाएंगे और इस हमले में आईएसआई की भूमिका की जांच कराएंगे। कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण ढ़ंग से सुलझाने पर जोर देंगे। इसके अलावा वर्ष 1999 के करगिल ऑपरेशन की सच्चाई सार्वजनिक करते हुए परोक्ष रूप से वार्ता भी शुरू की जानी चाहिए। साल 1999 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रयास से नवाज शरीफ ने ऐतिहासिक लाहौर समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। वह सारी बातें नवाज शरीफ को याद हैं। वे कहते हैं कि वाजपेयी ने पाकिस्तान के बारे में बड़ी अच्छी बातें कही थीं, जो अभी भी मेरे (नवाज) जेहन में तरोताजा हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ से कहा था-‘नवाज साहब हम साल 1999 को भारत-पाकिस्तान के बीच सभी समस्याओं के सुलझने का वर्ष घोषित क्यों नहीं कर सकते।’ खैर, सीमा पार आतंकवाद के मामले में पीएमएल-एन प्रमुख नवाज शरीफ को आगे होगा और कोशिश करनी होगी कि पाकिस्तानी सरजमीं का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए न हो। वैसे जानकार मानते हैं कि नवाज शरीफ भारत से अच्छे रिश्तों के पैरोकार हैं। इस स्थिति में यह माना जा रहा है कि नवाज के हाथ में पाकिस्तान की कमान के आने के बाद भारत से रिश्ते बेहतर होंगे। नवाज शरीफ को सेना के साथ मिल कर ये भी तय करना है कि क्या भारत में मुंबई जैसे हमलों को वो रोक पाएंगे या नहीं। रिश्तों की बेहतरी के लिए कारोबारी संबंध भी मजबूत करने होंगे। वहीं दूसरी ओर भारतीयों की नजर में भी नवाज शरीफ को बेहतर माना जा रहा है। क्योंकि उन्हीं के प्रधानमंत्री रहते फरवरी 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए थे। हालांकि नवाज शरीफ के विदेश मंत्री सरताज अजीज की आत्मकथा से पता चलता है कि परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ के मंत्रिमंडल को भरोसा दिलाया था कि वो एक हफ्ते में श्रीनगर को हासिल कर लेंगे और इस पर नवाज शरीफ ने उन्हें आगे बढ़ने को कहा था। इसी के बाद कारिगल युद्ध हुआ था। लेकिन अब नवाज शरीफ जानते हैं कि कश्मीर का मसला जंग से नहीं सुलझ सकता है। बातचीत के जरिए ही इसे हल किया जा सकता है। अब नवाज शरीफ के चाल-चरित्र का आकलन करें तो पता चलेगा कि वे 1981 में पंजाब प्रांत के वित्तमंत्री बनाए गए थे। वक्त कैसे बदलता है यह आज नवाज़ शरीफ़ और परवेज़ मुशर्रफ़ से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। नवाज़ शरीफ़ आज सत्ता पर काबिज़ हैं और परवेज़ मुशर्रफ़ जेल मे हैं। मुशर्रफ़ का जेल से बाहर आना नवाज़ शरीफ़ की इच्छा पर बहुत हद तक निर्भर करेगा। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक और पंजाब विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री हासिल करने वाले नवाज़ शरीफ़ का जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक रईस परिवार में 25 दिसंबर 1949 को पैदा हुए मियां मोहम्मद नवाज़ शरीफ़ देश के दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। दो बेटों और एक बेटी के पिता नवाज़ शरीफ़ की पंजाब में लोकप्रियता का आलम यह है कि लोग उन्हें 'लायन ऑफ़ पंजाब' के नाम से बुलाते हैं। उनके भाई शहबाज़ शरीफ़ भी राजनीति में सक्रिय है। वे अभी पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री है। उनकी बेटी मरियम नवाज़ इस बार चुनाव तो नहीं लड़ी हैं लेकिन उन्होंने पीएमएल (एन) का चुनाव प्रचार ज़रूर किया है। राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक़ की एक विमान हादसे में हुई मौत के बाद शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) फ़िदा ग्रुप और जुनेजो ग्रुप में बंट गई। जुनेजों ग्रुप का नेतृत्व मोहम्मद खान जुनेजो के हाथ में था। इन दोनों ग्रुपों ने 1989 के आम चुनावों में बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) का मुक़ाबला करने के लिए सात धार्मिक और रूढ़िवादी पार्टियों के साथ गठबंधन कर इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद (आईजेआई) के नाम से एक मोर्चा बनाया। इसका नेतृत्व गुलाम मुस्तफ़ा जटोई और नवाज़ शरीफ़ के हाथ में था। इस गठबंधन ने बहुमत हासिल किया। नवाज शरीफ़ ने नैशनल असेंबली में बैठने की जगह पंजाब प्रांत का मुख्यमंत्री बनना बेहतर समझा। नवाज शरीफ़ नवंबर 1990 में देश के 12वें प्रधानमंत्री बने लेकिन सेना के बढ़ते दबाव की वजह से उन्होंने अप्रैल 1993 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 1993 में बहाल कर दिया था। फिर 1997 में हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी ने एक बार फिर शानदार जीत दर्ज की और नवाज़ शरीफ़ फिर प्रधानमंत्री बने। अपने प्रधानमंत्री काल में नवाज़ शरीफ़ ने कई संवैधानिक सुधार किए। इस वजह से उनका न्यायपालिका और सेना के साथ टकराव होता रहा। तत्कालीन सेना अध्यक्ष जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने 12 अक्टूबर 1999 को उनकी सरकार का तख्तापलट कर दिया। बहरहाल, अब नवाज शरीफ के हाथ एकबार फिर पाकिस्तान की कमान है। देखना है कि वे इसे किस तरह संचालित करते हैं।
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